CHART 41

 



किया गया विवरण बहुत रोचक और गहराई से ज्योतिषीय ज्ञान को दर्शाता है। इसमें कई महत्वपूर्ण ज्योतिषीय सूत्र और उनके व्याख्यान दिए गए हैं। इसे और सरलता से समझने और मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट करने के लिए, मैं इसे भागों में विभाजित कर रहा हूँ:


1. मंगल और बुध का संबंध: शिक्षा में बाधा

  • जब मंगल (Mars) और बुध (Mercury) का संबंध बनता है, जैसे:
    • मंगल बुध के 12वें भाव में हो।
    • मंगल और बुध एक ही भाव में हों।
  • इसका प्रभाव:
    • शिक्षा में बाधा (Break in Education)।
    • मंगल का आक्रामक स्वभाव और बुध का शिक्षा से संबंध इसे कठिन बना देता है।

2. बुध और गुरु (जुपिटर) का संबंध: बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिकता

  • बुध शिक्षा का और गुरु (जुपिटर) ज्ञान और दर्शन का कारक है।
  • यदि बुध के 2nd भाव में गुरु और केतु हों:
    • व्यक्ति बुद्धिमान होगा।
    • आध्यात्मिक झुकाव (Spiritual Inclination) बढ़ेगा।
  • केतु के कारण ध्यान और साधना में रुचि हो सकती है।

3. पांचवें और नौवें भाव का संबंध: संतान का भाग्य

  • पांचवां भाव: संतान और उसकी समृद्धि।
  • नवम भाव: भाग्य और आशीर्वाद।
  • यदि:
    • पांचवे भाव का स्वामी नौवें भाव में हो।
    • सूर्य (Sun) और बुध साथ हों।
  • प्रभाव:
    • संतान भाग्यशाली होगी।
    • व्यक्ति को संतान सुख मिलेगा।

4. सूर्य और बुध का योग: बुधादित्य योग

  • बुध और सूर्य का संबंध:
    • फादर बुद्धिमान और सम्मानित होंगे।
    • सरकार से नेम और फेम मिलेगा।
  • यदि सूर्य धनु राशि (सैजिटेरियस) में हो, जो गुरु का घर है:
    • पिता धार्मिक और ज्ञानी होंगे।

5. केतु और गुरु का संबंध: संपत्ति और पत्नी के माध्यम से धन

  • यदि केतु और गुरु का संबंध हो:
    • व्यक्ति को पत्नी के माध्यम से धन लाभ होगा।
    • पत्नी के कारण व्यक्ति की वित्तीय स्थिति मजबूत हो सकती है।

मुख्य सूत्र:

  1. मंगल और बुध का संबंध -> शिक्षा में बाधा।
  2. बुध और गुरु का संबंध -> बुद्धिमत्ता और आध्यात्मिकता।
  3. पांचवां और नौवां भाव -> संतान का भाग्य।
  4. सूर्य और बुध -> बुधादित्य योग -> पिता का सम्मान।
  5. केतु और गुरु -> पत्नी के माध्यम से धन।

यह विवरण ज्योतिषीय दृष्टिकोण से शनि के गोचर (ट्रांजिट) और मंगल के साथ उनके संयोजन के प्रभावों पर आधारित है। इसमें जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे वित्त, मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य, और पेशेवर प्रगति पर चर्चा की गई है। इसे और स्पष्ट रूप से समझने के लिए नीचे बिंदुवार मुख्य बिंदु दिए गए हैं:

1. शनि और मंगल का संयोजन:

  • जब शनि और मंगल एक साथ आते हैं, तो यह संयोजन कठिनाइयाँ और जीवन में संघर्ष का संकेत दे सकता है।
  • दूसरे चक्र (37-40 वर्ष) में शनि और मंगल की ऊर्जा मिलकर जीवन में चुनौतियाँ ला सकती हैं।

2. शनि के गोचर का समय और प्रभाव:

  • पहला चक्र (0-30 वर्ष): यह चक्र स्थायित्व और आधार बनाने के लिए होता है।
  • दूसरा चक्र (30-60 वर्ष): इसमें शनि जीवन के कठिन सबक सिखाते हैं। 37-40 वर्ष के बीच मानसिक तनाव, स्वास्थ्य समस्याएँ और वित्तीय चुनौतियाँ हो सकती हैं।
  • तीसरा चक्र (60-90 वर्ष): आत्मज्ञान और स्थायित्व का समय होता है।

3. शनि और चंद्रमा का संयोजन:

  • जब शनि और चंद्रमा साथ होते हैं, तो विष योग बनता है। यह मानसिक अशांति, तनाव, और नकारात्मक विचारों का कारण बन सकता है।
  • इस समय व्यक्ति को डिप्रेशन और एंजाइटी का अनुभव हो सकता है।

4. शनि के विभिन्न भावों में प्रभाव:

  • 12वां भाव: खर्चे और कठिनाइयों का समय।
  • 10वां भाव: पेशेवर प्रगति और स्थायित्व।
  • 3रा भाव: साहस और छोटे भाई-बहनों से मदद, लेकिन संघर्ष भी।

5. मंगल और राहु का संयोजन:

  • यह चोरी, धोखाधड़ी, या विवाद का संकेत दे सकता है।
  • व्यक्ति कानूनी मामलों में फंस सकता है लेकिन परिवार या भाई-बहनों से सहायता प्राप्त करेगा।

6. शनि और गुरु का प्रभाव:

  • गुरु की दृष्टि शनि पर सकारात्मकता ला सकती है और चुनौतियों को सहने की क्षमता प्रदान कर सकती है।
  • यह गोचर वित्तीय स्थिति और परिवारिक जीवन में स्थिरता ला सकता है।

सुझाव:

  • इस समय योग और ध्यान करना मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होगा।
  • गुरु मंत्रों का जाप और शनि की पूजा से राहत मिल सकती है।
  • जीवन में व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ें और धैर्य बनाए रखें।

यह भृगु नाड़ी ज्योतिष से जुड़ी हुई है, जो कुंडली के विभिन्न ग्रह योगों और स्थितियों के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं को समझाने का प्रयास करती है। इसमें पिछले जन्म के कर्म, वर्तमान जीवन के प्रभाव, और भविष्य की संभावनाओं का विवरण होता है।

इसमें कुछ मुख्य बिंदु हैं:

  1. पिछले जन्म के कर्म:

    • बृहस्पति (Jupiter) धनु राशि (Sagittarius) में और चंद्रमा (Moon) तुला (Libra) में थे।
    • पिछले जन्म में जातक ने अपनी माता को कष्ट दिया और उनकी संपत्ति छीन ली। इस वजह से माता ने श्राप दिया।
  2. वर्तमान जीवन में प्रभाव:

    • चंद्रमा के दूसरे भाव में शनि और मंगल का योग दर्शाता है कि जातक को माता से जुड़े कठिन अनुभव हो सकते हैं।
    • जातक को 50 वर्ष के बाद बेहतर समय देखने को मिलेगा।
  3. करियर और जीवनशैली:

    • शनि और मंगल का संयोजन जातक को मैन्युफैक्चरिंग और मशीनरी से जुड़े व्यवसायों में ले जाता है।
    • शुक्र के दूसरे भाव में होने से जातक को चिकित्सा (medical knowledge) से संबंधित क्षेत्र में सफलता मिल सकती है।
  4. रेमेडी (उपाय):

    • मधुरा के मंदिर में देवी की पूजा करें।
    • कन्याओं को भोजन कराएं और उपहार दें।
  5. भविष्य की संभावनाएं:

    • जातक का एक भाई बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त करेगा।
    • शुक्र और चंद्रमा पर शनि की दृष्टि जातक की बहन या बेटी को प्रसिद्धि दिला सकती है।
    • मंगल और राहु का संयोजन:

      • यह संयोजन चोरी, धोखाधड़ी, या दकैती का संकेत दे सकता है। इस दौरान व्यक्ति आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है।
      • यह स्थिति कानूनी मामलों में फंसने का कारण बन सकती है, लेकिन परिवार या छोटे भाई-बहनों से मदद मिल सकती है।
    • शनि और मंगल का संयोजन:

      • इस संयोजन में संघर्ष के अलावा व्यक्ति को अपनी इच्छा शक्ति और मानसिक धैर्य पर भी ध्यान देना पड़ता है, क्योंकि यह संयोजन नकारात्मक मानसिकता और क्रोध को बढ़ा सकता है।
    • मंगल और राहु का गोचर:

      • यह समय विवादों और संकटों को बढ़ा सकता है, जहां व्यक्ति की स्थिति कठिन हो सकती है और उसे कानूनी संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। यह वक्त घबराहट, धोखाधड़ी और चोरी जैसी घटनाओं को जन्म दे सकता है।
      • शनि के गोचर के दौरान प्रभाव:

        1. शनि और मंगल का संयोजन:

          • जब शनि और मंगल एक साथ होते हैं, तो यह संयोजन कठिनाइयाँ और जीवन में संघर्ष का संकेत दे सकता है।
          • शनि के गोचर के दौरान, विशेष रूप से 37-40 वर्ष के बीच, शनि और मंगल की ऊर्जा मिलकर जीवन में चुनौतियाँ ला सकती हैं। इस समय पर व्यक्ति को मानसिक तनाव, शारीरिक समस्याएँ और वित्तीय संकट का सामना हो सकता है।
        2. शनि के गोचर का समय और प्रभाव:

          • पहला चक्र (0-30 वर्ष): इस समय शनि जीवन में स्थायित्व और आधार बनाने के लिए प्रभाव डालता है।
          • दूसरा चक्र (30-60 वर्ष): शनि जीवन के कठिन सबक सिखाता है और इस समय व्यक्ति मानसिक तनाव, स्वास्थ्य समस्याएँ और वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर सकता है, खासकर 37-40 वर्ष के बीच।
          • तीसरा चक्र (60-90 वर्ष): इस समय व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त करता है और स्थायित्व की ओर बढ़ता है।
        3. शनि और चंद्रमा का संयोजन:

          • शनि और चंद्रमा का संयोजन मानसिक अशांति और तनाव का कारण बन सकता है। यह समय विष योग के रूप में आ सकता है, जिससे व्यक्ति को डिप्रेशन और एंजाइटी का सामना हो सकता है।
        4. शनि के विभिन्न भावों में प्रभाव:

          • 12वां भाव: यह समय खर्चे और कठिनाइयों का हो सकता है, जहां व्यक्ति को मानसिक और भौतिक परेशानियाँ हो सकती हैं।
          • 10वां भाव: यह समय पेशेवर प्रगति और स्थायित्व का हो सकता है, जिससे करियर में वृद्धि और सफलता मिल सकती है।
          • 3रा भाव: साहस और छोटे भाई-बहनों से मदद मिल सकती है, लेकिन संघर्ष और संघर्षपूर्ण परिस्थितियाँ भी आ सकती हैं।
        5. मंगल और राहु का संयोजन:

          • शनि के गोचर के दौरान जब मंगल और राहु साथ होते हैं, तो यह चोरी, धोखाधड़ी, या दकैती का संकेत दे सकता है।
          • व्यक्ति कानूनी मामलों में फंस सकता है, लेकिन परिवार या भाई-बहनों से सहायता प्राप्त करेगा।
        6. शनि और गुरु का प्रभाव:

          • गुरु की दृष्टि शनि पर सकारात्मकता ला सकती है और चुनौतियों को सहने की क्षमता प्रदान कर सकती है।
          • शनि के गोचर के दौरान गुरु की स्थिति वित्तीय स्थिति और परिवारिक जीवन में स्थिरता ला सकती है।

        सुझाव:

        • इस समय योग और ध्यान करना मानसिक तनाव को कम करने में सहायक होगा।
        • गुरु मंत्रों का जाप और शनि की पूजा से राहत मिल सकती है।
        • जीवन में व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ें और धैर्य बनाए रखें।

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